प्रयागराज के महाकुंभ नगर में सुविधाओं का संगम
प्रयागराज में 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा से महाकुंभ की शुरुआत हो रही है। 14 जनवरी को मकर संक्रांति का दूसरा स्नान है। इसे शाही स्नान और अमृत स्नान भी कहते हैं। संगम के मेला क्षेत्र में महाकुंभ नगर सज-धजकर तैयार है। दुनियाभर से पहुंचने वाले लाखों-करोड़ों तीर्थयात्रियों को संचार संपर्क में असुविधा न हो, इसके लिए केंद्रीय दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने व्यापक इंतजाम किए हैं।
महाकुंभः प्रयागराज बनाएं सबके बिगड़े काज
प्रयागराज में महाकुंभ मेले की शुरुआत 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा के दिन होगी। मान्यता है कि महाकुंभ के दौरान संगम स्नान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। श्रद्धालुओं के संकल्प पूरे होते हैं। महाकुंभ मेले का समापन 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन होगा। प्रयागराज में हर 12 साल के अंतराल पर महाकुंभ का आयोजन होता है।
छत्तीसगढ़ : कोरिया जिले के तर्रा, बसेर और मेन्द्रा में 77 वर्ष बाद पहुंची बिजली
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के सुदूर गांवों में बिजली पहुंचने की यह कहानी केवल तकनीकी विकास की नहीं है, बल्कि धैर्य, संघर्ष और आशा की जीत का प्रतीक है। यह एक ऐसा अवसर है जो इन गांवों के लोगों की जिंदगी में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है।
नए वर्ष में भारत के विकास की असीम संभावनाएं
भारत के लिए नूतन वर्ष 2025 कई क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियों का बड़ा तोहफ़ा देने वाला साल साबित हो सकता है। भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था की तरफ लंबी छलांग लगा सकता है। सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाएं देने में भी हम सारे संसार का नेतृत्व करने की स्थिति में पहुंच सकते हैं। इसी तरह भारत विश्व भर के पर्यटकों के लिए एक सुरक्षित और सस्ता आकर्षण का केंद्र भी बन सकता है जहाँ पर्यटकों की रुचि के तमाम केंद्र, हर तरह के ख़ानपान, स्थानीय कुटीर उद्योगों के उत्पाद और गाइड के रूप में अच्छे पढ़े-लिखे बढ़िया अंग्रेज़ी
बुद्धिः ज्ञान का उपकरण
संसार प्रत्यक्ष है। संसार समझने के लिए प्रकृति-प्रदत्त पाँच इन्द्रियाँ हैं। आँख से देखते हैं, कानों से सुनते हैं। त्वचा से स्पर्श करते हैं। जीभ से स्वाद लेते हैं और नाक से सूंघते हैं। संक्षेप में रूप, रस, गंध, ध्वनि और स्वाद ही संसार समझने के उपकरण हैं। मन को इनका स्वामी बताया गया है। दृश्य पर मन न लगे तो देखना व्यर्थ हो जाता है। गीत-संगीत में मन न लगे तो सुनना बेकार। यही बात सभी इन्द्रियों पर लागू होती है। पढ़ता-सुनता आया हूँ कि इन्द्रियों से प्राप्त सूचना मस्तिष्क तक जाती है। मस्तिष्क निर्णय लेता है। मस्तिष्क में लाखों कोष हैं। इसमें अध्ययन-अनुभव के संग्रह हैं।
ग्राहक सशक्तिकरण ही ‘ग्राहक संप्रभुता’ का मार्ग
भारतीय चिंतन के दृष्टिकोण से अर्थव्यवस्था के केंद्र बिंदु ‘ग्राहक संप्रभुता’ पर विचार करने से पहले ‘ग्राहक’ शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। क्योंकि वैश्विक ग्राहक आंदोलन ‘ग्राहक’ को बाजार में की जाने वाली खरीद-बिक्री की गतिविधियों तक ही सीमित रखता है। जबकि ‘ग्राहक’ शब्द अंग्रेजी में ‘उपभोक्ता’ या ‘कस्टमर’ का पर्याय नहीं है।
किसानों की बुलंद आवाज़ थे चौधरी चरण सिंह
देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह व्यक्ति नहीं विचारधारा थे। चौधरी चरण सिंह ने हमेशा यह साबित करने की कोशिश की थी कि किसानों को खुशहाल किए बिना देश का विकास नहीं हो सकता। उनकी नीति किसानों व गरीबों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की थी। वे कहते थे कि देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है। उनका कहना था कि भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है। जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे वो देश कभी तरक्की नहीं कर सकता।
श्रीनिवास रामानुजन : संख्याओं के जादूगर
प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को भारत में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ मनाया जाता है, जो देश के महान् गणितज्ञों में से एक श्रीनिवास रामानुजन की स्मृति में उनके जन्मदिवस पर मनाया जाता है। करीब एक दशक पहले चेन्नई में रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह में गणित में उनके अविस्मरणीय योगदान को याद कर उन्हें सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ मनाए जाने का निर्णय लिया गया था।
महाकुंभ का आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व आर्थिक महत्व
आधुनिकता की उन्मत्त गति की विशेषता वाली दुनिया में, कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो लाखों लोगों को अपने से बड़े उद्देश्य की खोज में एकजुट करने की क्षमतारखते हैं। महाकुंभ मेला, 12 वर्षों की अवधि में चार बार होने वाला एक श्रद्धेय मेला, इस उद्देश का उदाहरण है।कुंभ मेला, दुनिया भर में सबसे बड़ा शांतिपूर्ण सम्मेलन है, जिसमें लाखों तीर्थयात्री आते हैं जो अपने पापों को शुद्ध करने और आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने के लिए पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं।
आधुनिक जीवन में ध्यान की प्रासंगिकता
ध्यान किसी तरह का धार्मिक उपक्रम नहीं है। यह बाहर से हट कर अंदर के अनुभवों को सम्बोधित करने वाला वैचारिक (रिफलेक्टिव) प्रयास है। एकाग्रता तथा अवगत या सचेत होना ही इसका मुख्य आधार है जो वर्तमान में बने रहने और मन की शांति को रेखांकित करता है। दरअसल आँख, कान, नाक, त्वचा आदि हमारे सभी संग्राहक बाहर की दुनिया से लगातार उद्दीपक लाते रहते हैं और उस सारी सामग्री की हमारे मन को व्याख्या करनी पड़ती है।