News Saga Desk
रांची। झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान में एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है—राज्य की स्पेशल फोर्स झारखंड जगुआर में पदस्थापित DSP रैंक के अधिकारी ऑपरेशन में खुद को शामिल नहीं कर रहे हैं। रविवार को जब पुलिस महानिदेशक (DGP) राज्य में नक्सल गतिविधियों की समीक्षा कर रहे थे, तब इस बात का खुलासा हुआ।
बैठक में पाया गया कि नक्सल मोर्चे पर असली ज़मीनी लड़ाई इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी लड़ रहे हैं। जबकि DSP स्तर के अफसरों की भागीदारी नाम मात्र की है। यह स्थिति वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नागवार गुज़री और उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि अब हर हाल में DSP को भी नक्सल अभियान में जाना होगा।
अब सिर्फ 5 जिले ही नक्सल की पकड़ में
राज्य के अधिकतर हिस्सों से नक्सलवाद का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। मौजूदा समय में गिरिडीह, गुमला, लातेहार, लोहरदगा और पश्चिमी सिंहभूम—यही पांच जिले अब भी नक्सल गतिविधियों से प्रभावित माने जा रहे हैं। खास बात यह है कि भारत के 12 सबसे अधिक नक्सल प्रभावित जिलों में अब झारखंड का सिर्फ एक जिला—पश्चिमी सिंहभूम—शामिल है।
95% खत्म हुआ नक्सलवाद, लेकिन छोटे गिरोह अब भी चुनौती
पुलिस के मुताबिक झारखंड में नक्सलवाद की जड़ें अब लगभग 95% तक उखाड़ दी गई हैं। परंतु माओवादी संगठन के कमजोर पड़ते ही कुछ छोटे-छोटे उग्रवादी गिरोह सक्रिय हो गए हैं। ये संगठन अब लेवी वसूलने, आगजनी और गोलीबारी जैसी वारदातों के ज़रिए अपनी उपस्थिति जताने की कोशिश कर रहे हैं। व्हाट्सएप कॉल के ज़रिए कारोबारियों से रंगदारी मांगना इनका नया ट्रेंड बन गया है।
कहां-कहां सक्रिय हैं नक्सली दस्ते?
- चाईबासा (जराइकेला व टोंटो): मिसिर बेसरा, पतिराम मांझी, सिंगरई और अजय महतो के नेतृत्व में करीब 65 कैडर वाले दस्ते सक्रिय हैं।
- गोइलकेरा और सोनूवा (चाईबासा): मेहनत और अमित मुंडा का दस्ता, जिसमें 30 नक्सली शामिल हैं।
- जागेश्वर बिहार (बोकारो): विवेक और रघुनाथ के नेतृत्व वाला दस्ता, 23 कैडर के साथ सक्रिय।
- चंदवा (लातेहार): रविंद्र गंझू के नेतृत्व में 5 नक्सली।
- लावालौंग (चतरा): मनोहर गंझू का दस्ता, जिसमें 3 नक्सली शामिल हैं।
- मोहम्मदगंज और हैदरनगर (पलामू): नितेश यादव का दस्ता, 6 नक्सलियों के साथ सक्रिय।
अब आगे क्या?
DSP स्तर के अधिकारियों की फील्ड में अनुपस्थिति अब सवालों के घेरे में है। वरिष्ठ अधिकारियों का यह सख्त संदेश—”केवल बैठकों से नहीं, मैदान में उतरकर दिखाएं नेतृत्व”—झारखंड पुलिस की रणनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। नक्सलवाद से लगभग मुक्त हो चुके राज्य में अब अंतिम लड़ाई इन बचे हुए टुकड़ों के खिलाफ लड़ी जानी है।
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